सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा बरकरार रखी, उम्रकैद को बनाया सामान्य नियम
चर्चा में क्यों: सुप्रीम कोर्ट ने बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) के मामले में मृत्युदंड की संवैधानिकता को बरकरार रखा, जबकि जीवन कारावास को मानक नियम के रूप में अनिवार्य किया।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि मृत्युदंड केवल 'विशेष कारणों' के आधार पर ही दिया जाना चाहिए, जहाँ आजीवन कारावास का विकल्प 'स्पष्ट रूप से समाप्त' (unquestionably foreclosed) हो जाता है। इस फैसले के तहत अदालतों को अपराध की परिस्थितियों और आरोपी की व्यक्तिगत परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक होगा।
प्रीलिम्स बिंदु (3)
- संस्थासुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया: भारत की सर्वोच्च न्यायिक संस्था।
- तथ्यबचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980): यह एक लैंडमार्क केस है जिसमें डेथ पेनल्टी (death penalty) को बरकरार रखा गया था।
- तथ्यआजीवन कारावास (Life imprisonment): न्यायिक विवेक (judicial discretion) के तहत आपराधिक सजा के लिए इसे मानक (norm) के रूप में अनिवार्य किया गया है।
मेन्स के लिए
प्रश्न: भारत में मृत्युदंड अधिरोपित करने के लिए न्यायिक दिशा-निर्देशों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और प्रतिशोधात्मक न्याय तथा जीवन के अधिकार के बीच संतुलन पर चर्चा कीजिए।
- न्यायिक विवेक: अपराध की गंभीरता और व्यक्ति की व्यक्तिगत परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाना
- संवैधानिक संघर्ष: आर्टिकल 21 के तहत 'जीवन के अधिकार' और राज्य की मृत्युदंड देने की शक्ति के बीच तालमेल
मुख्य शब्द: न्यायिक विवेक · प्रतिशोधात्मक न्याय · अनुच्छेद 21 · मृत्युदंड · कानून का शासन