बॉम्बे हाई कोर्ट ने सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के खिलाफ एक्सटर्नमेंट ऑर्डर रद्द किया
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चर्चा में क्यों
बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक SDPI नेता के विरुद्ध जारी किए गए एक्सटर्नमेंट (बाहर निकालने) के आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायालय ने निर्णय दिया कि सरकारी नीतियों के विरुद्ध विरोध करना ऐसे उपायों को न्यायोचित नहीं बनाता है और यह संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
पृष्ठभूमि
न्यायमूर्ति माधव जमदार की अध्यक्षता में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के विरुद्ध जारी एक वर्ष के बहिष्करण (externment) आदेश को रद्द कर दिया। न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि उक्त आदेश सार्वजनिक असहमति को दबाने के उद्देश्य से दुर्भावनापूर्ण (mala fide) तरीके से जारी किया गया था और यह याचिकाकर्ता के गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन करता है।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- संविधानभारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है।
- संस्थाएक्सटर्नमेंट ऑर्डर आमतौर पर बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ रायोट्स एक्ट (Bombay Prevention of Riots Act) या इसी तरह के राज्य-विशिष्ट सुरक्षा कानूनों के तहत जारी किए जाते हैं।
- तथ्यन्यायालय ने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महासचिव के विरुद्ध जारी एक वर्षीय एक्सटर्नमेंट (externment) आदेश को रद्द कर दिया।
मेन्स के लिए
Q. एक लोकतंत्र में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध एक्सटर्नमेंट (निर्वासन) आदेशों का उपयोग, असहमति के मौलिक अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन किस सीमा तक करता है? का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
उत्तर के आयाम
- Constitutional conflict: Balancing state security measures against the fundamental right to peaceful protest and freedom of expression.
- Executive overreach: Risk of mala fide use of preventive detention-like measures to suppress political opposition and civil society dissent.
कीवर्ड: Mala fide · Freedom of expression · Right to dignity · Judicial review · Public dissent · Constitutional safeguards
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