सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, विरोध प्रदर्शन से रेहड़ी-पटरी वालों की 'प्रोटेस्ट इकोनॉमी'
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चर्चा में क्यों
सुप्रीम कोर्ट ने किराना कमेटी दिल्ली द्वारा दायर एक याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें त्योहारों के दौरान दो महीने के लिए विरोध प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग की गई है। यह याचिका रेहड़ी-पटरी वालों के लिए एक 'प्रोटेस्ट इकोनॉमी' (protest economy) के उभरने के संदर्भ में दी गई है।
पृष्ठभूमि
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बग्ची की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट त्योहारों के दौरान होने वाले विरोध प्रदर्शनों पर रोक लगाने से संबंधित एक याचिका की जांच कर रहा है। कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और व्यापारियों के आजीविका के अधिकार के बीच उत्पन्न होने वाले तनाव पर प्रकाश डाला।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- तथ्यकिराना कमेटी दिल्ली: याचिकाकर्ता ने त्योहारों के सीजन के दौरान दो महीने के लिए विरोध प्रदर्शन पर रोक की मांग की है।
- पदचीफ जस्टिस सूर्यकांत: 3 नवंबर, 2026 को टिप्पणी के दौरान अध्यक्षता करने वाले जज।
मेन्स के लिए
प्रश्न: सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार और आजीविका के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने में आने वाली संवैधानिक चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर के आयाम
- अधिकारों का टकराव: स्थानीय व्यापारियों के आजीविका के अधिकार के सामने अनुच्छेद 19(1) की अभिव्यक्ति की आज़ादी को संतुलित करना
- रेगुलेटरी फ्रिक्शन: पीक फेस्टिव सीजन के दौरान सार्वजनिक व्यवस्था और कमर्शियल हितों के बीच संतुलन
- आर्थिक प्रभाव: 'प्रोटेस्ट इकोनॉमी' का उदय और शहरी व्यापार की गतिशीलता पर इसका असर
मुख्य शब्द: मौलिक अधिकार · आजीविका का अधिकार · अभिव्यक्ति की आज़ादी · सार्वजनिक व्यवस्था · न्यायिक संतुलन
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यह नोट सत्यधीश के समाचार फ़ीड से स्वचालित रूप से तैयार किया गया है और यूपीएससी सीएसई पाठ्यक्रम से जुड़ा है। उत्तर में उपयोग करने से पहले तथ्यों का मूल रिपोर्ट या पीआईबी से मिलान करें।