मद्रास हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, सरकार की आलोचना पर पुलिस न करे कार्रवाई
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राज्य और सरकार के बीच संवैधानिक अंतर: GS2 पॉलिटी और रूल ऑफ लॉ (Rule of Law) से संबंधित एक केस स्टडी।
चर्चा में क्यों
मद्रास हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि पुलिस को सरकार के बजाय राज्य की सेवा करनी चाहिए। कोर्ट ने सत्ताधारी दल की आलोचना करने या उसे अपशब्द कहने के कारण व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करने की आलोचना की है।
पृष्ठभूमि
मद्रास हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति एन. रमेश ने ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन के पार्षद डी. सुधा को अग्रिम जमानत (anticipatory bail) प्रदान की। कोर्ट ने यह माना कि अपमानजनक टिप्पणियों के मामलों में दंडात्मक गिरफ्तारी के बजाय मानहानि कानूनों (defamation laws) के माध्यम से कार्रवाई की जानी चाहिए।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- पदजस्टिस एन. रमेश: मद्रास हाई कोर्ट के जज।
- तथ्यडी. सुधा: ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन काउंसलर।
प्रीलिम्स अभ्यास प्रश्न
इस मामले में मद्रास हाई कोर्ट द्वारा किस व्यक्ति को अग्रिम जमानत (anticipatory bail) दी गई थी?
- (a)ए. कुमार
- (b)एस. लक्ष्मी
- (c)डी. सुधा
- (d)आर. मेनन
उत्तर देखें
उत्तर: (c) डी. सुधा — कोर्ट ने ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन के काउंसलर डी. सुधा को अग्रिम जमानत (anticipatory bail) प्रदान की।
मेन्स के लिए
प्रश्न: सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और लोकतांत्रिक असहमति की रक्षा करने के संदर्भ में, 'राज्य' और 'सरकार' के बीच संवैधानिक अंतर का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर के आयाम
- संस्थागत स्वायत्तता: अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा के लिए पुलिस को एग्जीक्यूटिव दबाव से मुक्त रखना
- कानूनी उपाय में बदलाव: राजनीतिक भाषण के लिए आपराधिक दबाव के बजाय सिविल मानहानि मुकदमों को प्राथमिकता
- संवैधानिक आदेश: व्यवस्था बनाए रखने के राज्य के कर्तव्य और सत्ता की आलोचना के अधिकार के बीच संतुलन
मुख्य शब्द: कानून का शासन · लोकतांत्रिक असहमति · कार्यपालिका की अतिरेक · न्यायिक समीक्षा · सार्वजनिक व्यवस्था
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यह नोट सत्यधीश के समाचार फ़ीड से स्वचालित रूप से तैयार किया गया है और यूपीएससी सीएसई पाठ्यक्रम से जुड़ा है। उत्तर में उपयोग करने से पहले तथ्यों का मूल रिपोर्ट या पीआईबी से मिलान करें।