रोमेश थप्पर बनाम स्टेट ऑफ मद्रास मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला और उसके बाद जवाहरलाल नेहरू द्वारा किए गए संवैधानिक संशोधनों को प्रेस की स्वतंत्रता पर उनके प्रभाव के संदर्भ में चर्चा में लाया जा रहा है
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चर्चा में क्यों
रोमेश थप्पर बनाम स्टेट ऑफ मद्रास मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला और उसके बाद जवाहरलाल नेहरू द्वारा किए गए संवैधानिक संशोधनों को प्रेस की स्वतंत्रता पर उनके प्रभाव के संदर्भ में चर्चा में लाया जा रहा है।
पृष्ठभूमि
रोमेश थप्पार बनाम मद्रास राज्य (क्रॉस रोड्स केस) में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि सरकार व्यक्तिगत राय के आधार पर प्रकाशनों पर मनमाने ढंग से रोक नहीं लगा सकती। इसके बाद, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं को स्पष्ट करने और अनुच्छेद 13(2) से 'राजद्रोह' (sedition) शब्द को हटाने के लिए एक संवैधानिक संशोधन पारित किया गया।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- स्थानरोमेश थापर बनाम स्टेट ऑफ मद्रास (Cross Roads case) प्रेस की आजादी से संबंधित एक लैंडमार्क जजमेंट था।
- तथ्ययह जजमेंट 27 मई, 1950 को द हिंदू (The Hindu) में प्रकाशित हुआ था।
- संविधानइस संशोधन के कारण Article 13(2) से 'sedition' को हटा दिया गया।
मेन्स के लिए
प्रश्न: रोमेश थापर मामले से लेकर समकालीन संवैधानिक सुरक्षा उपायों तक भारत में प्रेस की स्वतंत्रता के विकास का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
उत्तर के आयाम
- न्यायिक निगरानी: सार्वजनिक विमर्श में 'राजद्रोह' की व्यक्तिपरक व्याख्या बनाम राज्य की सुरक्षा हितों के बीच संतुलन
- विधायी मंशा: औपनिवेशिक काल की पाबंदियों से स्वतंत्र मीडिया के लिए संवैधानिक सुरक्षा की ओर बदलाव
मुख्य शब्द: प्रेस की स्वतंत्रता · अनुच्छेद 13(2) · राजद्रोह · न्यायिक समीक्षा · संवैधानिक संशोधन
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यह नोट सत्यधीश के समाचार फ़ीड से स्वचालित रूप से तैयार किया गया है और यूपीएससी सीएसई पाठ्यक्रम से जुड़ा है। उत्तर में उपयोग करने से पहले तथ्यों का मूल रिपोर्ट या पीआईबी से मिलान करें।