सुप्रीम कोर्ट: अब लिव-इन पार्टनर्स पर भी घरेलू हिंसा कानून लागू
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चर्चा में क्यों
सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा सुनिश्चित करनेके उद्देश्य से घरेलू क्रूरता कानूनों के दायरे का विस्तार किया है, जिसमें अब 'विवाह के स्वरूप' वाले लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं को भी शामिल किया गया है।
पृष्ठभूमि
उच्चतम न्यायालय ने 3 अगस्त, 2026 को 'डॉ. लोकेश बी.एच. एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य' मामले में अपना निर्णय सुनाया। न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि यदि विवाह करने का इरादा हो, तो IPC की धारा 498A (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 85) लिव-इन पार्टनर्स पर भी लागू होती है।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- अधिनियम / विधेयकभारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85, क्रूरता के संबंध में पूर्ववर्ती IPC की धारा 498A के अनुरूप है।
- संस्थाभारत का सर्वोच्च न्यायालय देश का सर्वोच्च न्यायिक निकाय है।
- तथ्ययह निर्णय विशेष रूप से विवाह के इरादे के साथ 'विवाह के स्वरूप' वाले लिव-इन संबंधों (live-in relationships) पर लागू होता है।
मेन्स के लिए
प्रश्न: घरेलू हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा उपायों के न्यायिक विस्तार को सह-जीवन (live-in relationships) संबंधों तक विस्तारित करने के संदर्भ में चर्चा कीजिए। क्या यह कदम भारतीय आपराधिक कानून के सुधारात्मक उद्देश्यों के अनुरूप है? का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
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