सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जिन व्यक्तियों के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, उन्हें राज्य की निगरानी (State Surveillance) से डरने की जरूरत नहीं है
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चर्चा में क्यों
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जिन व्यक्तियों के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, उन्हें राज्य की निगरानी (State Surveillance) से डरने की जरूरत नहीं है। अदालत ने निजता के अधिकार (Right to Privacy) को एक मौलिक अधिकार के रूप में बरकरार रखा।
पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट ने फोन टैपिंग मामले में आरोपी और तेलंगाना स्पेशल इंटेलिजेंस ब्यूरो (SIB) के पूर्व प्रमुख टी. प्रभाकर राव की पुलिस हिरासत को 25 दिसंबर तक बढ़ा दिया है। कोर्ट ने उनके खिलाफ किसी भी प्रकार के दंडात्मक कदम (coercive steps) उठाने पर रोक लगा दी है और अगली सुनवाई की तारीख 16 जनवरी तय की है।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- पदटी. प्रभाकर राव: तेलंगाना स्पेशल इंटेलिजेंस ब्यूरो (SIB) के पूर्व प्रमुख।
- तथ्यसुप्रीम कोर्ट ने जीवन के अधिकार के तहत प्राइवेसी (Privacy) को एक मौलिक अधिकार के रूप में बरकरार रखा।
- तथ्यटी. प्रभाकर राव की पुलिस कस्टडी 25 दिसंबर तक बढ़ा दी गई है।
मेन्स के लिए
प्रश्न: राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए राज्य की निगरानी करने की शक्ति और व्यक्तिगत निजता के मौलिक अधिकार के बीच उत्पन्न होने वाले अंतर्विरोधों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर के आयाम
- संवैधानिक संघर्ष: अनुच्छेद 21 के संरक्षण और राज्य की सुरक्षा की ज़रूरतों के बीच संतुलन
- न्यायिक निगरानी: मनमानी निगरानी और इंटेलिजेंस एजेंसियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की ज़रूरत
मुख्य शब्द: निजता का अधिकार · स्टेट सर्विलांस · मौलिक अधिकार · न्यायिक समीक्षा · खुफिया जानकारी जुटाना
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यह नोट सत्यधीश के समाचार फ़ीड से स्वचालित रूप से तैयार किया गया है और यूपीएससी सीएसई पाठ्यक्रम से जुड़ा है। उत्तर में उपयोग करने से पहले तथ्यों का मूल रिपोर्ट या पीआईबी से मिलान करें।