सुप्रीम कोर्ट: नए कानून के तहत लिव-इन पार्टनर्स को मिलेगा डोमेस्टिक क्रुएल्टी से प्रोटेक्शन
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चर्चा में क्यों
उच्चतम न्यायालय ने भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत घरेलू क्रूरता के संरक्षण के दायरे का विस्तार करते हुए इसमें विवाह के समान लिव-इन संबंधों को भी शामिल कर लिया है।
पृष्ठभूमि
3 अगस्त, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 और 86 सह-जीवन (live-in relationships) में होने वाली घरेलू क्रूरता को सम्मिलित करती हैं। न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य घरेलू क्रूरता को रोकना है, जो अनिवार्य रूप से वैवाहिक स्थिति से बंधा हुआ नहीं है।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- अधिनियम / विधेयकभारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 और 86, पूर्ववर्ती IPC की धारा 498A के अनुरूप हैं।
- संस्थाभारत का सर्वोच्च न्यायालय देश का सर्वोच्च न्यायिक निकाय है।
- तथ्ययह निर्णय न्यायमूर्ति संजय करोल द्वारा दिया गया।
मेन्स के लिए
Q. भारत में घरेलू हिंसा से संबंधित कानूनों के विकास और भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत लिव-इन संबंधों को संरक्षित संस्थाओं के रूप में मान्यता देने की ओर न्यायिक बदलाव का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर के आयाम
- judicial activism
- evolving societal norms
- protection of vulnerable individuals
- legal parity between marriage and live-in
कीवर्ड: judicial interpretation · domestic cruelty · Bharatiya Nyaya Sanhita · societal realities · legal protection
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यह नोट सत्यधीश के समाचार फ़ीड से स्वचालित रूप से तैयार किया गया है और यूपीएससी सीएसई पाठ्यक्रम से जुड़ा है। उत्तर में उपयोग करने से पहले तथ्यों का मूल रिपोर्ट या पीआईबी से मिलान करें।