इंटरसेक्स लोगों के लिए गाइडलाइंस पर सुप्रीम कोर्ट ने सेंटर और स्टेट्स से मांगा जवाब
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चर्चा में क्यों
भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने केंद्र और राज्यों को यह निर्देश दिया है कि वे इंटरसेक्स व्यक्तियों के लिए छह महीने के भीतर पृथक वैधानिक दिशा-निर्देश तैयार करें, ताकि उन पर जबरन चिकित्सा हस्तक्षेप को रोका जा सके।
पृष्ठभूमि
अधिवक्ता शमशराविश रेन द्वारा दायर याचिका में एक राष्ट्रीय चिकित्सा प्रोटोकॉल समिति के गठन और इंटरसेक्स शिशुओं पर अनावश्यक सर्जरी पर प्रतिबंध की मांग की गई है। इस याचिका का कानूनी आधार संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (गैर-भेदभाव) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) पर आधारित है।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- संविधानअनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है।
- संविधानअनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।
- संविधानअनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है, जिसमें शारीरिक स्वायत्तता (bodily autonomy) भी शामिल है।
- तथ्यसुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से जुलाई 2026 तक प्रतिक्रिया मांगी है।
मेन्स के लिए
Q. भारत में अंतःलिंगी (intersex) व्यक्तियों को गैर-सहमति वाले चिकित्सा हस्तक्षेपों से बचाने के लिए उनकी शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा की रक्षा हेतु आवश्यक संवैधानिक सुरक्षा उपायों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
उत्तर के आयाम
- Bodily autonomy conflict: Tension between parental rights and the child's right to physical integrity under Article 21
- Legislative vacuum: Absence of specific statutory protocols leading to unregulated and harmful medical practices on intersex infants
- Institutional oversight: Need for a National Medical Protocol Committee to standardize ethical medical guidelines across states
कीवर्ड: Bodily Autonomy · Constitutional Morality · Non-discrimination · Statutory Guidelines · Human Rights
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यह नोट सत्यधीश के समाचार फ़ीड से स्वचालित रूप से तैयार किया गया है और यूपीएससी सीएसई पाठ्यक्रम से जुड़ा है। उत्तर में उपयोग करने से पहले तथ्यों का मूल रिपोर्ट या पीआईबी से मिलान करें।