सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि जबरन या अनैच्छिक नारको टेस्ट (Narco tests) असंवैधानिक हैं
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चर्चा में क्यों
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि जबरन या अनैच्छिक नारको टेस्ट (Narco tests) असंवैधानिक हैं। कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के आदेश को पलटते हुए आत्म-अभिशंसन के विरुद्ध अधिकार (Right against self-incrimination) को मजबूत किया है।
पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट ने जबरन नार्को टेस्ट (narco tests) के खिलाफ फैसला सुनाते हुए 'सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010)' के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया। कोर्ट ने यह माना कि बिना स्वतंत्र और सूचित सहमति (free and informed consent) के प्राप्त जानकारी का उपयोग आपराधिक कार्यवाही में सबूत के रूप में नहीं किया जा सकता।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- संविधानसंविधान का Article 20 आत्म-अभियोग (self-incrimination) के विरुद्ध अधिकार प्रदान करता है।
- संस्थासुप्रीम कोर्ट ने नार्को टेस्टिंग (narco testing) से संबंधित पटना हाई कोर्ट के आदेश को पलट दिया।
- तथ्यसेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (Selvi v. State of Karnataka, 2010) ने नारको टेस्ट और अन्य फॉरेंसिक तकनीकों के लिए दिशा-निर्देश स्थापित किए।
मेन्स के लिए
प्रश्न: फॉरेंसिक तकनीकों के संदर्भ में, अपराधों की जांच करने की राज्य की शक्ति और आत्म-अभिशंसन के विरुद्ध व्यक्ति के मौलिक अधिकार के बीच उत्पन्न होने वाले द्वंद्व का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर के आयाम
- संवैधानिक टकराव: आर्टिकल 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा और जांच की प्रभावशीलता के बीच संतुलन
- साक्ष्य की सत्यता: जबरन स्वीकारोफ्त से 'फेयर ट्रायल' के सिद्धांत और न्यायिक विश्वसनीयता को खतरा
- नैतिक सुरक्षा: न्यूरो-साइंटिफिक फॉरेंसिक प्रक्रियाओं में सूचित सहमति और प्रक्रियात्मक निगरानी की ज़रूरत
मुख्य शब्द: आत्म-अभिशंसन के विरुद्ध अधिकार · सूचित सहमति · संवैधानिक नैतिकता · फॉरेंसिक सबूत · व्यक्तिगत स्वायत्तता
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यह नोट सत्यधीश के समाचार फ़ीड से स्वचालित रूप से तैयार किया गया है और यूपीएससी सीएसई पाठ्यक्रम से जुड़ा है। उत्तर में उपयोग करने से पहले तथ्यों का मूल रिपोर्ट या पीआईबी से मिलान करें।