वकीलों और नारीवादी समूहों (ALIFA और NAJAR) ने संवैधानिक उल्लंघन का आरोप लगाते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से 'ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट बिल, 2026' पर अपनी सहमति रोकने का आग्रह किया है
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चर्चा में क्यों
वकीलों और नारीवादी समूहों (ALIFA और NAJAR) ने संवैधानिक उल्लंघन का आरोप लगाते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से 'ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट बिल, 2026' पर अपनी सहमति रोकने का आग्रह किया है।
पृष्ठभूमि
ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट बिल, 2026, पहचान प्रमाण पत्र जारी करने के लिए मेडिकल बोर्ड की स्थापना का प्रस्ताव करता है। विरोधियों का तर्क है कि इस विधेयक में उचित सार्वजनिक परामर्श की कमी है और यह लिंग के आत्म-निर्धारण (self-determination of gender) के अधिकार का उल्लंघन करता है।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- तथ्य140 वकीलों और नारीवादियों ने राष्ट्रपति को पत्र सौंपा।
- संस्थाALIFA (All-India Feminist Alliance) और NAJAR (National Alliance for Justice, Accountability and Rights) इसमें शामिल मुख्य एडवोकेसी ग्रुप्स (advocacy groups) हैं।
मेन्स के लिए
प्रश्न: भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राज्य-अनिवार्य चिकित्सा प्रमाणन और लैंगिक आत्म-निर्णय के अधिकार के बीच उत्पन्न होने वाले अंतर्विरोधों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
उत्तर के आयाम
- संवैधानिक टकराव: गरिमा का अधिकार बनाम जेंडर आइडेंटिटी के लिए राज्य द्वारा अनिवार्य मेडिकल जांच
- प्रक्रियात्मक कमी: हाशिए के समुदायों के लिए कानून बनाते समय सार्थक सार्वजनिक परामर्श का अभाव
- संस्थागत निगरानी: मेडिकल बोर्ड्स के गेटकीपर के रूप में काम करने की संभावना, जिससे पहचान की पहचान में बाधा आ सकती है
मुख्य शब्द: आत्मनिर्णय का अधिकार · संवैधानिक नैतिकता · जेंडर आइडेंटिटी · जनता से परामर्श · पिछड़े वर्ग के अधिकार
राजव्यवस्था एवं संविधान पर और नोट्स
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यह नोट सत्यधीश के समाचार फ़ीड से स्वचालित रूप से तैयार किया गया है और यूपीएससी सीएसई पाठ्यक्रम से जुड़ा है। उत्तर में उपयोग करने से पहले तथ्यों का मूल रिपोर्ट या पीआईबी से मिलान करें।