नेपाल के विदेश मंत्रालय ने लिपुलेख दर्रे के माध्यम से धार्मिक यात्रा फिर से शुरू करने पर भारत के खिलाफ विरोध दर्ज कराया है
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चर्चा में क्यों
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने लिपुलेख दर्रे के माध्यम से धार्मिक यात्रा फिर से शुरू करने पर भारत के खिलाफ विरोध दर्ज कराया है। नेपाल का दावा है कि यह क्षेत्र 1816 की संधि के आधार पर उसका है।
पृष्ठभूमि
भारत और चीन ने लिपुलेख दर्रे के माध्यम से तीर्थयात्रा को फिर से शुरू करने पर सहमति व्यक्त की है। COVID-19 महामारी के कारण इस यात्रा को 2020 में रोक दिया गया था। नेपाल 1816 की एक संधि के आधार पर इस क्षेत्र पर अपना दावा पेश करता है, जबकि भारत का कहना है कि इस दर्रे का उपयोग 1954 से तीर्थयात्रा के लिए किया जा रहा है।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- स्थानलिपुलेख पास: हिमालय में स्थित एक उच्च-ऊंचाई वाला पहाड़ी दर्रा, जो भारत और नेपाल के बीच क्षेत्रीय विवाद का विषय है।
- तथ्य1816: लिपुलेख पास पर अपने क्षेत्रीय दावे के समर्थन में नेपाल द्वारा उद्धृत संधि का वर्ष।
- तथ्य1954: भारत द्वारा लिपुलेख पास (Lipulekh Pass) का उपयोग धार्मिक तीर्थयात्राओं के लिए किया जा रहा है।
मेन्स के लिए
प्रश्न: भारत की पड़ोस की कूटनीति के संदर्भ में, सीमा पार धार्मिक तीर्थयात्राओं के प्रबंधन और क्षेत्रीय विवादों से जुड़ी जटिलताओं का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर के आयाम
- डिप्लोमैटिक घर्षण: ऐतिहासिक संधि की व्याख्या और बॉर्डर पास के समकालीन प्रशासनिक इस्तेमाल के बीच टकराव
- भू-राजनीतिक गतिशीलता: द्विपक्षीय सीमा स्थिरता पर त्रिपक्षीय समझौतों (भारत-चीन-नेपाल) का प्रभाव
- संप्रभुता की चिंताएं: धार्मिक स्वतंत्रता और तीर्थयात्रा लॉजिस्टिक्स के साथ क्षेत्रीय अखंडता और सीमा सुरक्षा का संतुलन
मुख्य शब्द: क्षेत्रीय अखंडता · द्विपक्षीय कूटनीति · सीमा पार आवाजाही · संप्रभुता · नेबरहुड फर्स्ट
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यह नोट सत्यधीश के समाचार फ़ीड से स्वचालित रूप से तैयार किया गया है और यूपीएससी सीएसई पाठ्यक्रम से जुड़ा है। उत्तर में उपयोग करने से पहले तथ्यों का मूल रिपोर्ट या पीआईबी से मिलान करें।