सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि कला और सिनेमा का उपयोग समुदायों को बदनाम करने के लिए नहीं किया जा सकता
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चर्चा में क्यों
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि कला और सिनेमा का उपयोग समुदायों को बदनाम करने के लिए नहीं किया जा सकता, और इस बात पर जोर दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को डराने-धमकाने या हिंसा की धमकी से दबाया नहीं जाना चाहिए।
पृष्ठभूमि
न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति बी.वी. नागरथ्ना की एक पीठ ने 'ब्रह्मन समाज ऑफ इंडिया' द्वारा दायर एक याचिका के जवाब में यह फैसला सुनाया। अदालत ने फिल्मों की स्क्रीनिंग के खिलाफ हिंसा की धमकियों की निंदा की और बंधुत्व (Fraternity) को बनाए रखने के संवैधानिक महत्व पर जोर दिया।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- तथ्यइस फैसले में विशेष रूप से धर्म, भाषा, जाति या क्षेत्र के आधार पर समुदायों को बदनाम करने (vilification) के मुद्दे को संबोधित किया गया।
मेन्स के लिए
प्रश्न: भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और सांप्रदायिक सद्भाव एवं बंधुत्व बनाए रखने के संवैधानिक अधिदेश के बीच संतुलन का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर के आयाम
- संवैधानिक टकराव: आर्टिकल 19(1) और सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के राज्य के कर्तव्य के बीच संतुलन
- न्यायिक निगरानी: कलात्मक अभिव्यक्ति को डरा-धमकाकर दबानेरोकने में न्यायपालिका की भूमिका
- सामाजिक एकजुटता: सांप्रदायिक अपमान के लिए सांस्कृतिक माध्यमों के इस्तेमाल पर रोक
मुख्य शब्द: भाईचारा · भाषण की स्वतंत्रता · सांप्रदायिक सद्भाव · न्यायिक समीक्षा · संवैधानिक नैतिकता
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यह नोट सत्यधीश के समाचार फ़ीड से स्वचालित रूप से तैयार किया गया है और यूपीएससी सीएसई पाठ्यक्रम से जुड़ा है। उत्तर में उपयोग करने से पहले तथ्यों का मूल रिपोर्ट या पीआईबी से मिलान करें।