कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में विधानसभा के पहले सत्र के दौरान राज्यपालों द्वारा सदन से बाहर जाने (walkouts) के विरोध प्रदर्शन ने उनके विवेकाधीन अधिकारों (discretionary powers) और संवैधानिक जनादेशों के बीच के अंतर पर बहस छेड़ दी है
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चर्चा में क्यों
कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में विधानसभा के पहले सत्र के दौरान राज्यपालों द्वारा सदन से बाहर जाने (walkouts) के विरोध प्रदर्शन ने उनके विवेकाधीन अधिकारों (discretionary powers) और संवैधानिक जनादेशों के बीच के अंतर पर बहस छेड़ दी है।
पृष्ठभूमि
ये घटनाएँ कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में विधानसभाओं के उद्घाटन सत्रों के दौरान हुईं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यह फैसला दिया है कि राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ (discretionary powers) सीमित हैं और वे जिम्मेदार सरकार की शक्तियों को रद्द नहीं कर सकतीं।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- संविधानअनुच्छेद 176(1) के अनुसार, राज्यपालों को विधानमंडल को बुलाने के कारणों पर उन्हें संबोधित करना आवश्यक है।
- पदराज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख और उत्तरदायी सरकार के सलाहकार के रूप में कार्य करते हैं।
- तथ्यकर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में गवर्नरों द्वारा वॉकआउट (Walkouts) आयोजित किए गए।
मेन्स के लिए
प्रश्न: भारतीय संघीय संरचना में एक 'संवैधानिक प्रमुख' बनाम एक 'स्वतंत्र अभिनेता' के रूप में राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
उत्तर के आयाम
- संवैधानिक टकराव: राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों और निर्वाचित जिम्मेदार सरकार के जनादेश के बीच संघर्ष
- न्यायिक निगरानी: लोकतांत्रिक जनादेश को प्रभावित न होने देने के लिए गवर्नर के कार्यों को सीमित करने पर सुप्रीम कोर्ट का रुख
मुख्य शब्द: संवैधानिक आदेश · विवेकाधीन शक्तियाँ · जिम्मेदार सरकार · संघवाद · न्यायिक समीक्षा
राजव्यवस्था एवं संविधान पर और नोट्स
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यह नोट सत्यधीश के समाचार फ़ीड से स्वचालित रूप से तैयार किया गया है और यूपीएससी सीएसई पाठ्यक्रम से जुड़ा है। उत्तर में उपयोग करने से पहले तथ्यों का मूल रिपोर्ट या पीआईबी से मिलान करें।