तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के राज्यपालों की आलोचना हो रही है क्योंकि वे निर्वाचित मंत्रिपरिषद द्वारा तैयार किए गए भाषणों के कुछ हिस्सों को छोड़ कर संवैधानिक परंपराओं से विचलन कर रहे हैं
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चर्चा में क्यों
तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के राज्यपालों की आलोचना हो रही है क्योंकि वे निर्वाचित मंत्रिपरिषद द्वारा तैयार किए गए भाषणों के कुछ हिस्सों को छोड़ कर संवैधानिक परंपराओं से विचलन कर रहे हैं।
पृष्ठभूमि
यह मुद्दा राज्यपाल की भूमिका से संबंधित है, जो एक संवैधानिक प्रमुख के रूप में मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करने के लिए अपेक्षित हैं। यह लेख निर्वाचित सरकारों और मनोनीत राज्यपालों के बीच होने वाले विवादों को सुलझाने के लिए संभावित सुधारों के स्रोत के रूप में सरकारिया और पंची आयोगों का संदर्भ देता है।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- संस्थागवर्नर: राज्य का संवैधानिक प्रमुख जो मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है।
- रिपोर्ट / सूचकांकसरकारिया कमीशन: केंद्र-राज्य संबंधों की जांच के लिए गठित कमीशन।
- रिपोर्ट / सूचकांकपंची कमीशन (Punchhi Commission): केंद्र-राज्य संबंधों और राज्यपाल की भूमिका की जांच के लिए गठित आयोग।
मेन्स के लिए
प्रश्न: निर्वाचित सरकार के संदर्भ में राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और दोनों के बीच सामंजस्य सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपायों का सुझाव दीजिए।
उत्तर के आयाम
- संवैधानिक टकराव: राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों और निर्वाचित मंत्रिपरिषद के जनादेश के बीच संघर्ष
- संस्थागत अस्पष्टता: राज्यपाल के भाषण की सामग्री पर स्पष्ट गाइडलाइन्स की कमी से राजनीतिक टकराव
- फेडरल इम्बैलेंस: नामांकित राज्यपालों द्वारा विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों के विधायी एजेंडे में बाधा डालने की संभावना
मुख्य शब्द: संवैधानिक प्रमुख · मंत्रिपरिषद · सरकारिया कमीशन · पुंछी कमीशन · संघवाद · विवेकाधीन शक्तियाँ
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यह नोट सत्यधीश के समाचार फ़ीड से स्वचालित रूप से तैयार किया गया है और यूपीएससी सीएसई पाठ्यक्रम से जुड़ा है। उत्तर में उपयोग करने से पहले तथ्यों का मूल रिपोर्ट या पीआईबी से मिलान करें।