'पीपल एंड नेचर' (People and Nature) में किए गए एक अध्ययन में 13वीं शताब्दी के मराठी ग्रंथों का हवाला देते हुए पश्चिमी महाराष्ट्र के सवाना (savannas) को खराब हो चुके जंगलों के रूप में देखने के नजरिए को चुनौती दी गई है
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चर्चा में क्यों
'पीपल एंड नेचर' (People and Nature) में किए गए एक अध्ययन में 13वीं शताब्दी के मराठी ग्रंथों का हवाला देते हुए पश्चिमी महाराष्ट्र के सवाना (savannas) को खराब हो चुके जंगलों के रूप में देखने के नजरिए को चुनौती दी गई है।
पृष्ठभूमि
शोधकर्ताओं ने 13वीं शताब्दी के 28 ऐतिहासिक ग्रंथों का विश्लेषण किया ताकि हिवारा, तरती और बभूला जैसी सवाना वनस्पतियों की पहचान की जा सके। यह अध्ययन बताता है कि औपनिवेशिक काल में लकड़ी के निष्कर्षण (timber extraction) से पहले ये परिदृश्य कम से कम 750 वर्षों तक बने रहे।
प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- पर्यावरणहिवारा, ताराटी और बाभूला को महाराष्ट्र के सवाना लैंडस्केप्स (savanna landscapes) की विशिष्ट फ्लोरा (flora) के रूप में पहचाना गया है।
- स्थानयह अध्ययन पश्चिमी महाराष्ट्र के सवाना इकोसिस्टम (savanna ecosystems) पर केंद्रित है।
- तथ्यऔपनिवेशिक काल में लकड़ी के निष्कर्षण (timber extraction) से पहले इस क्षेत्र में सवाना (savanna) प्रकार के वन कम से कम 750 वर्षों तक बने रहे।
मेन्स के लिए
प्रश्न: भारत में ऐतिहासिक पारिस्थितिक ज्ञान और सांस्कृतिक आख्यानों का एकीकरण आधुनिक जैव विविधता संरक्षण रणनीतियों को किस प्रकार सुदृढ़ और प्रभावी बनाता है? चर्चा कीजिए।
उत्तर के आयाम
- ज्ञान संबंधी अंतर: ऐतिहासिक पारिस्थितिक संदर्भ की कमी के कारण स्थिर सवाना इकोसिस्टम को खराब जंगल के रूप में गलत वर्गीकृत करना
- सांस्कृतिक-जैविक संबंध: स्थानीय जैव विविधता संरक्षण की अखंडता बनाए रखने के लिए स्वदेशी शब्दावली को संरक्षित करने की ज़रूरत
मुख्य शब्द: पारिस्थितिक इतिहास · जैव विविधता संरक्षण · सवाना इकोसिस्टम · सांस्कृतिक विविधता · औपनिवेशिक प्रभाव
पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी पर और नोट्स
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